साँझ
Sanjh, e-magzine
संपादिका - अंकिता पंवार
सहसंपादक - सुधीर मौर्य 'सुधीर'
संपादिका - अंकिता पंवार
सहसंपादक - सुधीर मौर्य 'सुधीर'
Friday, 1 June 2012
साँझ जून २०१२ , सम्पादकीय
जब दुनिया बनी तो उसके साथ ही बने सुख-दुःख. पर उनसे भी पहले शायर. हाँ जब तकलीफ से जूझती माँ की छातियों में दूध सूख गया और उसने भूख से रोते बच्चे को चुप करने के लिए लोरी गाई, वो थी दुनिया की पहली नज़्म.
फिर दौर आया नज्मो का, खूब लिखी गयी, हर मौजू पर. जिसमे से एक था निसर्ग, और उनमे भी सबसे ज्यादा साँझ और सवेरे पर. उगते सूरज को सबने सलाम किया पर साँझ का तो अपना महत्व हे. उसके बिना दिन अधुरा हे, निसर्ग अधुरा हे. जीवन चक्र अधुरा हे. इसकी सुन्दरता पर रीझ कर इसपर न जाने कितने लोगो ने न जाने कितनी नज्मे लिखी. और न जाने कितनी भविष्य में लिखी जाती रहेंगी.साँझ और काव्य का रिश्ता भी अज़ल से अटूट हे.
कागज बनाने की कला शायद सबसे पहले चीन ने ईजाद की, वहां से अरब गयी.और कागज बनाने की पहली मिल लगी इटली में १२७६ में. और इस सदी में आया इन्टरनेट का दौर और शुरू हुई वेब पत्रकारिता.
साँझ, आप के सामने हे और आप के सुझावों, और रचनाओ के स्वागत को तैयार हे.
आप के अमूल्य सुझाव ही हमारा मार्गदर्शन करेंगे.
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
जून २०१२ अतीत से
ग़ज़ल
देखना था हमे जवाल अपना
और भी हो गये है हम तनहा
एक ज़रा आया था, ख्याल अपना
दश्त हो, बाज-गश्त से आबाद
कोई दोहराय, फिर सवाल अपना
ये सफ़र ख़त्म यूँ नहीं होता
रास्ता बदलें, माह-ओ-साल अपना
देख, हम फिर, जला रहे है चिराग
ऐ हवा, होंसला निकाल अपना
शहरयार
अदम गोंडवी की ग़ज़ल
किसको उम्मीद थी जब रौशनी जवां होगी
कल के बदनाम अंधेरों पे मेहरबाँ होगी
मुझको लगता हे नई नस्ल बेजुबाँ होगी
खिले हें फूल कटी छातियों की धरती पर
फिर मेरे गीत में मासूमियत कहाँ होगी
आप आयन तो कभी गावं की चौपालों में
मे रहूँ या न रहूँ भूख मेजबाँ होगी
बकौल डार्विन बुजदिल ही मरे जायंगे
सरकशी यूँ ही 'अदम' मेरे कारवां होगी
अदम गोंडवी
फिराक गोरखपुरी की ग़ज़ल
वुसते-बेकराँ में खो जाए
आसमानों के राज़ हो जाए
क्या अजब तेरे चंद तर-दमन
सबके दागे-गुनाह धो जाए
शादो-नाशाद हर तरह के हें लोग
किस पे हंस जाए,किस पे रो जाए
यूँ ही रुसवाइयों का नाम उछले
इश्क में आबरू डुबो जाए
जिन्दगी क्या हे आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाए
फिराक गोरखपुरी
परवीन शाकिर की नज़्म
आज की शब तो कोई तौर गुज़र जायगी
रात गहरी हे मगर चाँद चमकता है अभी
मेरे माथे पे तेरा प्यार दमकता अभी
मेरी सांसो में तेरा लम्स महकता है अभी
मेरे सिने में तेरा नाम धडकता है abhi
जीस्त करने को मेरे पास बहुत कुछ हे अभी
तेरी आवाज़ का जादू है अभी मेरे लिए
तेरे मलबूस की खुशबु है अभी मेरे लिए
तेरी बाहें, तेरा पहलु है अभी मेरे लिए
सबसे बढकर, मेरी जां ! तूँ है अभी मेरे लिए
जीस्त करने को मेरे पास बहुत कुछ है अभी
आज की शब तो कोई तौर गुज़र जाएगी
परवीन शाकिर
जून २०१२ काव्य धरा
संजय वर्मा 'दृष्टि'
टेसू
ऐसे लगते मानो
खेल रहे हो पहाडो से होली
सुबह का सूरज
गोरी के गाल
जैसे बता रहे हो
खेली हे हुने भी होली
सन्ग टेसू के
प्रकृति के रंग की छटा
जो मोसम से अपने आप
आ जाती है धरती पर
फीके हो जाते हैं हमारे
निर्मित क्रत्रिम रंग
डर लगता है
कोई काट
न ले विरिछों को
ढँक न ले प्रदुषण सूरज को
उपाय ऐसा सोचें
प्राकृत के संग हम
खेल सके होली.
१२५, शहीद भगतसिंह मार्ग (लोहार पट्टी)
मनावर, जिला - धार, ४५४४४६
माँ जैसी
विनीता जोशी
माँ जैसी
जंगल के
बीचों- बिच
पसरी हे बूढी नदी
सूरज की ओर
पीठ किये
उसके
पत्थर के सिरहाने तले
अब भी बचें है
कल-कल कतरे सपने
मंसूबो की गहरी
कांख में दबाये
कभी झपकी लेती फिर
जग जाती
किसे क्या देगी का
हिसाब लगाती
एकदम माँ जैसी
तिवारी खोला
पूर्वी पोखर खाली
अल्मोरा -२६३६०१
09411096830
सबा युनुस
मुझे खोने के डर से..
1
मेरे हाथों की लकीरों में खुद को ढूंढ रहा था वो,
अपने अश्को को पलकों में छुपाये,
अपनी बेबसी पे हस रहा था वो..
बिखरे हुए ख्वाबो के टुकड़े बटोर कर,
मुझे हिम्मत दे रहा था वो,
सिसकती आँहों को सीने में दबाये,
उम्मीदों के महेल खड़े कर रहा था वो,
अपने जज्बातों से कुछ इस तरह लड़ रहा था वो,
के, किस्तों में हस रहा था,
और.. किस्तों में रो रहा था वो...
कानपूर
09336205773
सफलता सरोज
प्यार
प्यार है महल भावनाओ का
नीवं पे विश्वास की है जो खडा
आस की हर ईंट है इसमें गडी
गारे की हर सवेदन से जोड़ी गयी
प्यार भक्ति-शक्ति की प्राचीर है
टूटी न कभी, है बहुत तोड़ी गयी
प्यार है असीम दर्द वेदना
आराधना उपासना है प्यार है
प्यार में अनुभूति है, विभूति है
प्यार निराकार में, साकार में
प्यार गगन के हेरदय में पल रहा
प्यार धरा का असीम त्याग है
प्यार में ईश-सी पवित्रिता
नेह का निसर्ग्नीय वो बाग़ है.
द्वरा: सैनिक ट्रेडर्स,
चौबेपुर, कानपुर
मधुर गंजमुरादाबादी
हम-तुम
त्याग चिंतायं सभी तट पर कहीं
प्रेम-सागर में जगत से बेखबर
आज बेसुध हो बहे हम-तुम
अंगुलियाँ उठती अगर, उठती रहें
एक दूजे में परस्पर डूबकर
बहुँवो में रहें हम-तुम
बहुत गहरे पेठ मोती ला संके
पा सके आनंद जीवन का सही
अन न पीडायं सहें हम-तुम
प्रीती के उस चरम तक पहुंचे
हो जहाँ कुछ भी नहीं गोपन
खोल दें साड़ी तहें हम-तुम
गंज मुरादाबाद, उन्नाव
२०९८६९
09451376763
जून २०१२-कथासागर
Dr. Srimati Tara Singh
“ यह कैसी श्रद्धांजलि, यह कैसा प्यार “
एक दिन उन-होंने मुझसे कहा,’मेरे घर एक छोटी- सी पूजा का आयोजन है । मैं दो रोज पहले ही तुमको बता दूँगा । जिससे ऑफ़िस से छुट्टी न मिलने का तुम्हारा वहाना नहीं रहेगा । मैंने कहा,’आप प्यार से बुलाएँ और मैं नहीं आऊँ, ऐसा हो नहीं सकता । आप भरोसा रखिए, मैं अवश्य आऊँगी । समय बीतता चला गया ; महीने, छ: महीने हो गए लेकिन उन-होंने पूजा में आने की बात नहीं की । एक दिन मैं ही हँसी- मजाक में बोल गई,’ आपके घर कब आना है । रोज आल, कल में बदल जाता है लेकिन आपका बुलावा आने का इंतजार कभी खत्म नहीं होता है । क्या बात है , पुजा का प्रोग्राम कैंसिल कर दिये क्या ? उन-होंने कहा,’ नहीं, नहीं; असल में क्या हुआ, घर के लोग दो घंटे पहले प्रोग्राम बनाए और आनन- फ़ानन में अनुष्ठान करना पड़ा । तुमको खबर देने की मोहलत ही नहीं मिली ।मुझे माफ़ कर दो,अगली बार ऐसी गलती नहीं होगी ।’ मैंने कहा ,’ठीक है, मगर एक फ़ोन कर देने में तो सिर्फ़ एक मिनट चाहिए था । आप फ़ोन ही कर देते , मैं आ जाती । इस पर उन्होंने बार – बार क्षमा माँगी और कहा,’गलति तो मैंने सचमुच बहुत बड़ी कर डाली, लेकिन तुम मुझे क्षमा कर दो’ । मैंने भी सोचा,’ आदमी बुरा नहीं है, अच्छा है, तभी तो छोटी – सी गलती के लिए बार – बार क्षमा माँग रहा है ।’
कुछ दिनों बाद उनके एक रिश्तेदार मेरे घर आए । उन्होंने बताया, ’मैं आपके पड़ोस में सुशील जी के घर एक आयोजन में गया हुआ था । आपको सुशील जी ���े रास्ते में मिलते – जुलते देखा,समझ गया, आप उनके दोस्त हैं । तो सोचा , दोस्त के दोस्त से मिलता चलूँ । कल वापस लौट जा रहा हूँ ।’
मैंने पूछा,’ आपको मैंने कभी देखा नहीं, आप उनके घर कब से हैं ? उन्होंने कहा, ’यही, दश दिनों से । पूजा के चार दिन पहले ही आ गया था ।’ पूजा खत्म हुए छ: दिन बीत गये, अब लौट रहा हूँ । मैं आता नहीं, घर पर अभी काफ़ी व्यस्तता चल रही थी । लेकिन उनके बार – बार फ़ोन द्वारा आने की जिद मैं टाल नहीं सका ।’ सुनते ही मैं समझ गई, पूजा का आयोजन आनन – फ़ानन में नहीं, बल्कि एक सोची-समझी, तय की गई तिथि के अन्तर्गत ही सम्पन्न हुआ । सुशील जी , मुझे झूठ बोले कि बुरा नहीं मानिए, आपको बुलाने का समय नहीं मिला ।
जो भी हो, सुशील जी को मैं यह बताना ठीक नहीं समझी कि आप कितने झूठ का सहारा लेते हैं । वे अपनी मीठी बोली बोलकर, कितनों को अपना मित्र बनाकर, उनके अरमानों से खेलते हैं । मैं तो लगभग इस दुर्घटना को भूल चुकी थी । अचानक उन्होंने, पुन: एक रोज रास्ते में मेरी हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ’मित्र ! अगले महीने छ: जुलाई को मेरी माँ का स्वर्गवास हुए ३० साल हो जायगा । मैं हर साल इस तिथि को माँ की श्रद्धांजलि के रूप में मनाता आया हूँ । मंत्री – संत्री, सभी रहेंगे । मैं चाहता हूँ, तुम उसमें आओ ।’ मैने सोचा, लगता है इस बार ये अपनी भूल को सु्धारेंगे । इसलिए तय की हुई तिथि भी हमें बता रहे हैं । मैंने कहा,’ठीक है, मैं अवश्य आऊँगी ।’ चार तारिख को मैंने उन्हें फ़िर फ़ोन किया । सोचा जान लूँ, कितने बजे आना है । फ़ोन पर उनकी पत्नी ने बताया, ’ महाशय, घर पर नहीं हैं,वे बाहर गए हुए हैं, दश रोज बाद लौटेंगे ।’ मैंने कहा,’वो अपनी माँ की श्रद्धांजलि का अनुष्ठान जो होना था, उसका क्या हुआ ?’ मैं बोली,’वह तो हो गया । उनके बाहर जाने के एक दिन पहले ही, क्योंकि छ:जुलाई को उनकी दीदी के बेटे की शादी है । शादी की तिथि तो बदली नहीं जा सकती, इसलिए अम्मा की श्राद्धांजलि दो रोज पहले ही मना ली गई । मुझे बहुत दुख हुआ । समझ में नहीं आ रहा था कि यह शख्स जब सामने होता है, तब हरिश्चन्द्र की औलाद लगता है, लेकिन यह मिरजाफ़र से कम नहीं है ।
इससे बचकर हमें रहना होगा, पता नहीं, कब कौन सी मुसीबत इसके चलते खड़ी हो जाय ।
अचानक एक दिन फ़िर मिले । मैं तो मुँह फ़ेरकर निकल भागने की कोशिश में थी कि उन्होंने मेरा रास्ता रोक लिया । कहा,’ तुम बहुत नाराज हो मुझसे ? होना भी चाहिए, मैं बहुत धोखेबाज हूँ । क्या करूँ, नियति के आगे मेरा कुछ चलता नहीं और लोग समझते , मैंने ऐसा जानबूझ कर किया । तुम्हारे साथ एक बार नहीं, यह तो दूसरी बार हुई । मैं सामने खड़ा हूँ, मुझे जो चाहे , सजा दो । लेकिन मुझसे मुँह मत मोड़ो ।’ मेरा दिल पिघल गया । मैंने कहा, ’वो सब तो ठीक है, लेकिन आपके साथ कोई मजबूरी आ गई थी, मुझे फ़ोन कर देते ।’ उन्होंने कहा,’ फ़ोन कहाँ से करता, मेरा सेलफ़ोन तो चोरी हो गया है,उसमें तुम्हारा फ़��न नं० भी था ।’ तब मैंने पूछा, ’ सुशील जी ! पिछ्ले साल जो पूजा हुई थी, उसमें आपके मित्र , तिवारी जी भी आये थे । उन्होंने कहा,’ हाँ, वे किसी काम से मेरे घर आए थे । संयोग देखिए, उसी दिन मेरे घर पूजा थी ।’ मैंने कहा,’ नहीं सुशील साहब ! वो तो बता रहे थे, आपने उन्हें १५ दिन पहले खत लिखा; फ़ोन पर भी आने का बहुत आग्रह किया । तब जाकर कहीं वे आए । तो आप झूठ क्यों बोलते हैं ? अब तो उम्र हो रही, उस मालिक के पास जाने का । जवानी भर तो झूठ बोले , अब तो सच बोलिए ।’
तपाक से सुशील जी बोल उठे,’ मेरी माँ, मुझे बहुत प्यार करती थी । मुझे भी माँ से बहुत प्यार था । लेकिन मेरी झूठ बोलने की आदत से कभी- कभी नाराज हो जाया करती थी । कहती थी,’ बेटा! तुम सच तो क्यों नहीं बोलते ? झूथ बोलना, अच्छा नहीं होता । झूठ बोलनेवाला इनसान, हमेशा किसी न किसी मुसीबत में बना रहता है । अब तो अम्मा नहीं रही, मगर सपने में आज भी मुझसे मिलने आया करती है ।’ मैंने कहा,’आपको जब माँ से इतना प्यार है, तो उनके दिल की जो सबसे बड़ी ख्वाहि्श थी, उसे पूरा क्यों नहीं करते ? माँ को आपकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि आप सच बोलें । नहीं तो, उनकी आत्मा, पुत्र की चिंता में भटकती रह जायगी ।’
सुनते ही उन्होंने कहा,’मैं दुनिया छॊड़ सकता हूँ, लेकिन झूठ बोलना नहीं छोड़ सकता क्योंकि जब तक झूठ बोलता रहूँगा, अभी तक मेरी माँ, सच बोलने की जिद लेकर मुझसे मिलने मेरे सपनों में आती रहेगी । अगर मैंने सच बोलना शुरू किया, तो माँ मेरी तरफ़ से निश्चिंत हो जायेगी । फ़िर कभी मिलने नहीं आयेगी । अब तुम्हीं बताओ कि मुझे सच बोलना चाहिए या झूठ । जब कि किसी भी कीमत पर मुझे माँ चाहिए । माँ को देखे बिना, मैं भी जी नहीं सकूँगा ।’ उनके इस दर्द को मैं समझ पा रही थी; क्या जवाब दूँ कि अनचाहे मुँह से निकल गया झूठ ।
संपर्क – 1502,सी क्वीन हेरिटेज़, प्लाट- 6,से० – 18, सानपाड़ा, नवी मुम्बई - 400705
दूरभाष -09322991198, 022- 32996316; 08080468596
email :- rajivsinghonline@hotmail.com
स्वरचित पुस्तकें प्रकाशित -- 24
काव्य संग्रह -- 18
(१) एक बूँद की प्यासी (२) सिसक रही दुनिया (३) हम पानी में भी खोजते रंग (४) एक पालकी चार कहार (५) साँझ भी हुई तो कितनी धुँधली (६) एक दीप जला लेना (७) रजनी में भी खिली रहूँ किस आस पर (८) अब तो ठंढी हो चली जीवन की राख (९) यह जीवन प्रातः समीरण-सा लघु है प्रिये (१०) तम की धार पर डोलती जगती की नौका (११) विषाद नदी से उठ रही ध्वनि (१२) नदिया-स्नेह बूँद सिकता बनती (१३) यह जग केवल स्वप्न असार (१४) सिमट रही संध्या की लाली (१५) साँझ का सूरज (१६) तिमिरांचला (१७) दूतिका (१८) समर्पिता
गज़ल संग्रह ---4
(१) नगमें हैं मेरे दिल के (२) खिरमने गुल (३) बर्गे यासमन ( ४) हसरते गुल
कहानी संग्रह --- 1
(१) तृषा
उपन्यास - 1
दूसरी औरत
दूरभाष -09322991198, 022- 32996316; 08080468596
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स्वरचित पुस्तकें प्रकाशित -- 24
काव्य संग्रह -- 18
(१) एक बूँद की प्यासी (२) सिसक रही दुनिया (३) हम पानी में भी खोजते रंग (४) एक पालकी चार कहार (५) साँझ भी हुई तो कितनी धुँधली (६) एक दीप जला लेना (७) रजनी में भी खिली रहूँ किस आस पर (८) अब तो ठंढी हो चली जीवन की राख (९) यह जीवन प्रातः समीरण-सा लघु है प्रिये (१०) तम की धार पर डोलती जगती की नौका (११) विषाद नदी से उठ रही ध्वनि (१२) नदिया-स्नेह बूँद सिकता बनती (१३) यह जग केवल स्वप्न असार (१४) सिमट रही संध्या की लाली (१५) साँझ का सूरज (१६) तिमिरांचला (१७) दूतिका (१८) समर्पिता
गज़ल संग्रह ---4
(१) नगमें हैं मेरे दिल के (२) खिरमने गुल (३) बर्गे यासमन ( ४) हसरते गुल
कहानी संग्रह --- 1
(१) तृषा
उपन्यास - 1
दूसरी औरत
जून २०१२ व्यंग - मृदंग
स्वप्निल शर्मा
कुर्सी पर सवार लोकतंत्र
कुर्सी पर सवार लोकतंत्र
घोडा घास
चर गया
और आदमी अखबार.
इस फर्क को ढूढने में
जिन्दगी हो गई बीमार.
कब तक गुनगुने वादों के मन्त्र
यहाँ कुर्सी पर सवार हे लोकतंत्र.
हर कोई खिंच रहा हे
अपने साथ भीड़ को
भीड़ ढूंढ़ रही हे
एक अदद नीड़ को.
अब सोच के सन्दर्भ उखाड़ते जा रहे हे
सावधान हम खड़े हे, राष्ट्रगीत वो गा रहे हे.
ब्लाक कालोनी, मानवर
जिला- धार
४५४४४६
जून २०१२-लेख- आलेख
विश्वास की ज्योति –निकिता बेदी
हमारे जीवन में जब भी हम कोई नया कार्य करने जाते है |
तब हम डरते है की शयाद हम इस में सफलता ना प्राप्त कर सके ?
लेकिन , हम यह भूल जाते है की जीवन में अगर हमे असफलता का सामना करना पढ़ेगा |
तभी , ,तो हम और सहनशील और साहसी बन पाएगे |
तो व्यक्ति को कभी भी म्हणत करने से डरना नहीं चाहिए |
बल्कि और ज़्यादा मजबूत होना चाहिए |
की अगर हमे इस कार्य में सफलता नहीं मिली तो शयाद दूसरे कार्य में मिल जाएगी |
और इसके लिए हमे अपने अन्दर विश्वास की उत्पत्ति करनी होगी ?
विश्वास से तो व्यक्ति पूरा संसार जित सकता है |
तो अगर आपके दिल में विश्वास है तो ही आप आगे जिंदगी में बढ़ सकते है |
मानव जीवन में हर व्यक्ति को जीने के लिए देखना ज़रूरी है |
पर , कुछ लोग ऐसे भी है जो देख ही नहीं सकते |
लेकिन , फिर भी वो अपने मन की आखो से अपनी दुनिया को देखते है |
हम इंसान अपनी आखो से भी duniya की खूबसूरती को नहीं परख पाते |
और वो लोग बिना देखे ही सब कुछ देख ले ते है |
अगर , लोग चाहे तो अपने जीवन में उजाला अपने कर्म से ला सकते है |
Thursday, 3 May 2012
साँझ, मई २०१२
साँझ के मई २०१२ के अंक में,
अतीत से, में शहरयार की ग़ज़ल और परवीन शाकिर की नज़्म.
कव्यधरा में, अंकिता पंवार, विनीता जोशी,सुधीर मौर्या 'सुधीर' की कवियाये और बरकतुल्ला अंसारी की ग़ज़ल.
कथासागर में, सुधीर मौर्या 'सुधीर' की लघुकथा.
मई २०१२ अतीत से
मई २०१२ अतीत से,
शहरयार की ग़ज़ल
शहरयार की ग़ज़ल
ये काफिले यादो के, कहीं खो गए होते
एक पल भी अगर भूल से हम सो गए होते
ऐ शहर तेरा-नाम-ओ-निशा भी नहीं होता
जो हादसे होने थे , अगर हो गए होते
हर बार पलटते हुए घर को, यही सोचा
ऐ काश, किसी लम्बे सफ़र को गए होते
हम कुश हे, हमे धुप, विरासत में मिली हे
अजदाद कही पेड़ भी कुछ बो गए होते
किस मुह से कहे तुझसे समुन्दर के हे हक़दार
सेराब, सराबो से भी हम हो गए होते
शहरयार
नज़्म
कांच की सुर्ख चूड़ी
मिरे हाथ में
आज ऐसे खनकने लगी
जैसे कल रात, शबनम से लिखी हुई
तेरे हाथ की शोखियों को
हवाओं ने सुर दे दिया हो
परवीन शाकिर
मई २०१२ कव्यधरा
टूटता स्वप्न संसार
प्रेम, प्रतिच्छा, विरह
कितना कुछ महसूस कर जाती हूँ
में उस छन
जब भी
कौंधता हे
मेरे मश्तिष्क में
यहाँ कुछ भी नहीं होता ऐसा
जैसा होता हे हमारे
स्वप्न संसार में
न जाने क्यों
फिर भी खोजती रही तुम में
अपनी कोमल भावनाओ का
कल्पित चेहरा
जो की अब यथार्थ
के धरातल पर
टकराकर कर
टूट टूट कर बिखर गया हे
और में अवाक सी
पत्थर बन पड़ी हूँ
किसी
नदिया की पानी की
Ankita Panwar
द्वारा उदय पंवार
भारत विहार, निकट ऋषि गैस गोदाम
हरिद्वार रोड, ऋषिकेश-249201
9536914949
दहेज़ में दूंगी तुझे
गावं के पुराने
घर के चोखट में बने
चिडियों के घोसलों में
आज भी
चहचहाती होंगी चिड़िया
चिड़ियाएँ
तिनके बिखरा देती होंगी
सीड़ियों पर
घोसला बुहारते हुए
बचपन में माँ कहती थी
दहेज़ में दूंगी तुझे
ये साडी चिड़िया
तब में
सच मन लेती थी
सोचती थी
मुझे तडके उठा देंगी
दाल-चावल बिन देंगी
ये चिड़ियाँ
मगर सपना बनकर
रह गई बाते
आज आदमियों के जंगल में
दिखाई नहीं देती
कोई चिड़िया
क्या सोचेंगी माँ
अगर कहूँ की
माँ तुने
क्यों नहीं दी
चिड़िया मुझे
दहेज़ में
दहेज़ में दूंगी तुझे
गावं के पुराने
घर के चोखट में बने
चिडियों के घोसलों में
आज भी
चहचहाती होंगी चिड़िया
चिड़ियाएँ
तिनके बिखरा देती होंगी
सीड़ियों पर
घोसला बुहारते हुए
बचपन में माँ कहती थी
दहेज़ में दूंगी तुझे
ये साडी चिड़िया
तब में
सच मन लेती थी
सोचती थी
मुझे तडके उठा देंगी
दाल-चावल बिन देंगी
ये चिड़ियाँ
मगर सपना बनकर
रह गई बाते
आज आदमियों के जंगल में
दिखाई नहीं देती
कोई चिड़िया
क्या सोचेंगी माँ
अगर कहूँ की
माँ तुने
क्यों नहीं दी
चिड़िया मुझे
दहेज़ में
Vinita Joshi
तिवारी खोला,पूर्वी पोखार्खाली
अल्मोरा-२६३६०१०९४११०९६८३०
ग़ज़ल
मेरी वफाओं का वह मुझ को क्या सिला देगा
बहुत करेगा नया ज़ख़्म एक लगा देगा
खुदा नसीब करे उन को दायमी खुशिया
yaह बदनसीब तो हर हाल में दुआ देगा
फिरू में शहर की गलियों में या बियाबान में
तुम्हारे नाम की ही दिल तुझे सदा देगा
सितम हे नाज हसीनो का मशगला 'बरकत'
हमारे जुर्म की वह शोख क्या सजा देगा
बरकतुल्ला अंसारी
गंज मुरादाबाद, उन्नाव
0987208690
वो आँखे
वो आँखे
नीली झील सी गहरी
मेरे मन की प्रहरी
वो हसना वो इठलाना उनका
वो मेघ दिवस वो रात सुनहरी
पायल छंकाते आना उनका
हाथो का सतरंगी कंगना
मेरी आतारी वो कार्तिक की दुपहरी
सुधीर मौर्या 'सुधीर'
गंज जलालाबाद, उन्नाव
२०९८६९
09699787634
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